Thursday, November 10, 2011

वो मेरा बचपन

कितना खूबसूरत, मेरा वो अल्हड़ सा बचपन
कंचे की चट-चट में बीता वो दिन
जीत की खुशी कभी तो रहा कभी हार का गम
रंगबिरंगे कंचों में घूमता बचपन।
गिल्ली डंडे का है आज मैदान जमा
किसकी कितनी दूर,है यही शोर मचा
डंडे पे उछली गिल्ली कर रही है नाच
दूर कहीं गिरती,आ जाती कभी हाथ
भागते हैं कदम कितने बच्चों के साथ
गिल्ली डंडे में बीता है बचपन का राग।
कभी बित्ती से खेलते कभी मिट्टी का घर
पानी पे रेंगती वो बित्ती की तरंग
भर जाती थी बचपन में कितनी उमंग।
कुलेड़ों को भिगोकर तराजू हैं बनाए
तौल के लिये खील-खिलौने ले आए
सुबह-सुबह उठकर दिये बीनने की होड़
लगता था बचपन है,बस भाग दौड़
सारे खेलों में ऊपर रहा गिट्टी फोड़
सात-सात गिट्टियाँ क्या खूब हैं जमाई
याद कर उन्हें आँख क्यूं भर आई।
हाँ घर-घर भी खेला सब दोस्तों के साथ
एक ही घर में सब करते थे वास
हाथ के गुट्टों में उछला,वो मासूम बचपन
दिल चाहे फिर लौट आए वो मधुबन
तुझ सा न कोई और दूसरा जीवन
कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन…

Saturday, November 5, 2011

मैं

माना गहरे तक ज़मीं में गड़ा हूँ,
मगर खुश हूँ, कि अपनी जड़ों पर खड़ा हूँ ॥

झुकता हूँ मैं सिर्फ़ मेरे ख़ुदा के आगे,
तू मुश्किलों से पूछ कि मैं कितना कड़ा हूँ ॥

लोग अपने लिए ग़ैरों का नामोनिशां मिटा देते,
मगर अपने लिए हर बार मैं सिर्फ़ ख़ुद से लड़ा हूँ ॥
उतरा लहर-सा कभी समंदर के सीने पर,
कभी कश्ती की मानिंद अपने साहिल से बिछड़ा हूँ ॥

तुझे अब हर पल नयी रंगतों का शहर दिखता हूँ,
क्या मालूम तुझे हर पल में कितनी बार उजड़ा हूँ ॥

हर तूफ़ान ने चाहा मुझे पत्तों-सा उड़ा देना,
पर बरसों से इसी राह पर पत्थर बनकर अड़ा हूँ ॥

अनगिनत ख़्वाहिशों के आशियां मेरे दिल में हैं,
मैं हरदम सुलगती इन बस्तियों से बड़ा हूँ ॥

Thursday, November 3, 2011

कहाँ है बिहार? एक प्रश्नचिंह............

चमचमाता बिहार. जगमगाता बिहार. दमकता और हीरों जड़ा बिहार. मुख्यमंत्री और सत्ता पार्टी का सपना की अपना बिहार चमचमाता, चमकता और जगमगाता हो. जी हाँ सफलता और खुशियाँ आयीं तो बहुत , बहुत से आयाम भी पाए गए. बहुत सी चुनौतियों को जीता गया पर क्या सचमुच अभी भी ये बिहार वो बिहार बन पाया है जो बनना चाहिए. कहाँ है बिजली कहाँ है? कहाँ है पानी? कहाँ है अब भी भ्रष्टाचार और असंतोष में कमी. कहाँ है आम जनता को आज भी सुकून, आराम और मौलिक सुखों को खुशियों की अनुभूति. मुझे ऐतराज नहीं है इस बात से की बिहार ने प्रगति की है. परन्तु सवाल वही है. आखिर घर में रोटी क्यों नहीं है?

बिहार की पढ़ी-लिखी जनता अपने लिए नौकरी और अच्छी लाईफस्टाइल तो निश्चित कर रही है पर बहार जाकर? क्या यहाँ की पिछडी जनता के दुःख-दर्द या सुविधाओं की कमी का एहसास है? आप पढ-लिख कर बाहर जा रहे हैं देश भर में नौकरी कर रहे हैं विदेशों का भ्रमण कर रहे हैं. विदेशों में नौकरियां पा रहे हैं और उनके लिए उनके देश या उनके परिवेश को अपना कर चार चाँद लगा रहे हैं.   पर क्या आप उनके बारे में सोंच रहे हैं वो आपके अपने रिश्तेदार भी हैं भाई-बहन भी हैं और अगर खून का नाता नहीं है तो तो कम से कम एक जगह के होने का एहसास तो है. आप कर रहे हैं उनके लिए कुछ? आप लड रहे हैं उनके लिए?   बिहार आगे बढ़ रहा है खुशी की बात है. बिहार के लोग आगे बढ़ रहे हैं, खुशी की बात है? बिहारी आगे बढ़ रहे हैं, ये भी खुशी की बात है. देश के कितने राज्य अपने राज्य का दिवस मानते हैं? हम तो वाकई उनसे आगे बढ़ रहे हैं. और आगे ही नहीं बढ़ रहे ये एहसास भी दिला रहे हैं. 
 पर ये सब तो दिखावा लगता है न ऊपरी दिखावा. क्यूंकि अंदर से तो आज भी बिहार, बिहारवासी, बिहारी आज भी पीछडे ही हैं. कुछ वर्गों को छोड़ क्या सभी विकास की ओर अग्रसित हैं? वक्त और माहौल शायद मैंने गलत चुना हो शायद आपको बताने के लिए पर क्या वाकई आपको लगता है की ऐसे वक्त में मुलभुत बातों को इनकार कर देना चाहिए. और अगर आप मानते हैं की इनकार कर देना चाहिए तो बताईए की आपको बिजली कितने घंटे मिलती है? आपको पानी मिलता है मुनिसिपलटी का? क्या आपको गन्दगी और सफाई से निजात मिली है? क्या आपको साफ़ सुन्दर और सुदृढ़ सड़कें मिली हैं. क्या आपको भ्रस्टाचार कहीं नहीं दिखता? क्या आपको ट्राफिक और प्रशासन से शिकायत नहीं है?

जगमगा दो ये शहर, गाँव-गांव, पहर-पहर जगमगा दो ये पूरी धरती ये नील गगन जगमगा दो. पर सिने की धधकती आरजुओं को मत कुचलो, की इनके भी फुल खिला दो. ज़रूरत बस बिजली–पानी और थोड़े से सुख की है. कुछ सपनों को पूरा करने की है.

आईये हम भी मनाएं खुशी . पर थोडा सा दिल में मलाल है की आज भी वो परिपूर्ण बिहार के लिए नहीं पर सब एक तरफ चल दिये हैं तो हम भी उनके पीछे  हैं. नहीं है इतनी खुशी.

Tuesday, October 18, 2011

मै हिन्दुस्तानी हूँ

न तू तू हूँ न मै मै हूँ , मै आज तेरी ही कहानी हूँ ,
सच कहता हूँ आज तो मै सिर्फ हिन्दुस्तानी हूँ,
मै ज्ञान नहीं, मै ध्यान नहीं, अरमां नहीं, भगवान नहीं,
मत देख तू मुझको प्यारे, मै तेरी ही आँखों का पानी हूँ,
सच कहता हूँ आज तो मै सिर्फ हिन्दुस्तानी हूँ,
... जो रूठ चले वो रूठ चले,
उनसे क्या सरोकार हमारा जिनके मंसूबे ऐसे टूट चले
हे खुदा तूने ये भेद क्यों बनाया है
हिन्दू ने क्या पाया जो मुस्लिम ने न पाया है,
सच कहता आज मै तेरी ही कहानी हूँ ,
आज तो मै सिर्फ हिन्दुस्तानी हूँ,
अब तक रक्तपात हुआ सिर्फ इस बटवारें से
ऐसा लगता जैसे आसमान बिछड़ गया हो तारे से
न मै शर्मा ,न मै वर्मा, मै शास्वत कर्मा हूँ ,
खान न कहना प्यारे मै खान नहीं खानदानी हूँ
न तू तू हूँ न मै मै हूँ , मै आज तेरी ही कहानी हूँ ,
सच कहता हूँ आज तो मै सिर्फ हिन्दुस्तानी हूँ,

Sunday, October 16, 2011

जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........

सागर होती होगी दुनिया, इक पल में मै तर जाऊँगा,
ठान लिया है जो मन में, इक दिन मै कर जाऊँगा,
वादा मेरा इस दुनिया से, इस जग में जीने वालों से,
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा .........
ना समझौता न सुनवाई, ना काफ़िर की तारीखें
कलम उठाकर सस्त्र बनाकर सीधा ही लड़ जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
मेरी शिक्षा मेरा धन है, जीवन है जो सब पर अरपन है
खौले खून तो जेठ महीना बहते आंसू सावन है
परछाईं में रहने वालों, मुझको पागल कहने वालों,
कलम बना के अपनी मलहम, पीड़ा सब हर जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........

Tuesday, September 27, 2011

चाह

मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...

चाहता मैं अपने हर साथियों के साथ रहना
चाहता हर होंठ पर मुस्कान धरना।
मैं दुखो से त्रान पाना चाहता हूँ।
मैं हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...। ।

सब सुखी, सानंद हों, यह कामना है
स्नेह की वर्षा सतत, यह भावना है,
मैं तुम्हारे प्यार का वरदान पाना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...

तौलते है लोग पैसे से यंहा हर चीज को
वे फलों से आंकते है बीज को।
लाभ-लोभों की घुटन से मुक्त होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...

अर्थ के सब दास दानाब बन रहे है
वाक् छल से मनुजता को छल रहे है।
मैं सहज इंसान होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ..
. मैं तुम्हारे प्यार का भूखा अकिंचन
चाहता हूँ मीन-सा एक मुक्त जीवन
मैं तुम्हारा हो संकुं, वरदान एकल चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...

Tuesday, September 6, 2011

मेरा जीवनपथ

मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
मैं फूलों के सेज पर सोने नहीं,
कांटो पर चलने आया हूँ
तुम मुझको ना कहो विश्राम करो,
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को अब तो तूफ़ान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो

अब तो अधर पर अंगार लेकर
पग पग पर मुश्कान लाया हूँ
अपने इस जीवन पथ में,
देखे हैं मैंने कई तूफ़ान यहाँ,
लौट गया जो भय से उनका क्या
मैं तो अब मर्घट से जीवन को बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चलाअब किस्मत से..
सौ बार हलाहल विष का प्याला पान करके आया हूँ ..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी में ही जलती है…
शोलो से ही श्रृंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही तो सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
अब तुम मेरे पग-पग पर जलती चट्टान धरो…
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो

फूलों से जग आसान नहीं होता है…
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है…
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगति भी..
है नाश जहां निर्माण वहीं पर होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे…
तुम मेरी हर बस्ती अब वीरान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता…
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वे मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ़ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाषाण करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
 

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