Wednesday, February 9, 2011

कौन हूँ मैं???



कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
.....
मयकदे में जाते ही फिर इक कहानी हो गयी,
कातिलाना मदहोश मेरी ये जवानी हो गयी,
अब ढूंढें तो दूंढ़े किसे इस शहर में,
सुना है मेरी यादों में अब तो वो दीवानी हो गयी,

आज कहता हूँ आपसे ईमान से,
जिंदगी तो मुझसे बेमानी हो गयी,
खुशियाँ भी मिलती है अब तो गम के चादर ओढकर,
मौत तो मासूम है ये जिंदगी ही सयानी हो गयी...

मिला जब मै आईने से,
मेरा अक्श भी मुझको देखकर रोता है,
क्या कहूँ उससे अब इस तूफान के बाद,
जब मेरी ये रूह ही बे रवानी हो गयी.

प्रशांत कौशिक

Tuesday, February 8, 2011

बचपन


इस दागदार दुनिया में , गुनाह लगता हैं हैं बड़ा हो जाना....
बस बचपन दिखता बेदाग यहाँ....,
गुजारिश मेरे मौला मुझे सच्चा जी लेने दे ..
इस दुनिया में मुझे बच्चा फिर से हो लेने दे ....

कुछ कह ना सकूँ , चुप रह ना सकूँ,
जीवन की इन राहों में
अब तो मैं जी ना सकूँ , मर न सकूँ,
मेरे मौला अब तो इन राहों में मुझे कच्चा रह लेने दे,
मेरे दिल कि कुछ बातें दिल की ज़ुबानी कह लेने दे
इस दुनिया में मुझे बच्चा फिर से हो लेने दे ....

जीवन का वो पल भी अजीब होता था.
न हँसने की वजह ही होती थी न रोने का बहाना होता था
अब तो मेरे दिल का हर कोना जैसे सुना सुना रहता है,
ना तो अब ये हँसता है ना ही अब ये रोता है,
गुजारिश मेरे मौला फिर से कुछ पल तो हँसने और रोने दे,
कुछ पल फिर से जी लेने दे,
इस दुनिया में मुझे बच्चा फिर से हो लेने दे ....

Friday, February 4, 2011

मन का सागर


अशांत सागर है ये मन मेरा पत्थर ना फेकों ए हमनशीं
दर्द की लहरें हैं, ना खेलो, दर्द ना मिल जाए कहीं

कसक बन के दिल में तुम हलचल सी करते हो
पास आकार भी ना अपने से बन के मिलते हो .

ठंडी आहों का भी असर तुम पर अब होता नहीं
मनुहार कर के भी तो ये दिल पिघलता नहीं .

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरा 'मैं' तुम्हारे 'मैं ' से मिलते नहीं.

लो बुझा लेता हूँ अरमानों की इस कसकती लौ को
दफ़ना देता हूँ तुझमें ही इन दगाबाज़ चाहतों को.

प्यास बुझाने को मयखाने भी कहाँ बचे साकी
छू भी लें तो वो एहसास कहाँ बचे बाकी.

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.

इस सागर में तुम पत्थर न फेंको ए हमनशीं
पत्थर न फेंको ए हमनशीं...........

Wednesday, February 2, 2011

ये मेरा आगाज़ था, अंदाज़ तो बाकी है,
अभी तो सिर्फ पहाड़ों को लांघा है, अभी तो खुला असमान बाकी है,

कह दो उनसे जो खिलखिलाते हैं,
हार गया इस रण में तो क्या,
ढल गया मेरा सूरज तो क्या
अभी तो मेरा इम्तहान बाकी है

मुझे डर नहीं इस अँधेरे का,
खौफ नहीं उस तूफ़ान का भी,
शाम ढल गया है तो क्या,
अभी तो मेरी ख्वाहिशों की उड़ान बाकी है.

कहते है लोग तो कहने दो,
मैं वो धुआं नहीं जो उड़ जाऊँगा
मैं तो मील का पत्थर हूँ जो कभी हिला ही नहीं,
बता दो उन्हें अभी तो मेरा सूरज ढला है
अभी तो मेरा चाँद बाकी है.

एक इंतजार


मै आऊंगा चंदा की झिलमिल चांदनी बनकर,
बारिस की फुहार बनकर,
सुनोगी तुम मुझे कोयल की कूक में,
दिखुंगा मै तुम्हे शाम की चिराग में,

लौटूंगा जब मै तुम्हारे ख्वाबों में,
एक नई रवानी बनकर,
बसंती बयार बनकर,
महसूस करोगी तुम मुझे पवन के हर झोंके में,

सूरज की पहली किरण में,
पंछिओं के सुर के साथ,
छूवूँगा तुम्हें जब मै चुपके से,
तब पहचान तो लोगी स्पर्श मेरा.


प्रशांत कौशिक

Tuesday, February 1, 2011

ये रोशनी

Myspace Candles Graphics Burning Candle Clipart



सोचना ये है की रौशनी आएगी कैसे,
जो अंधेरो में है उन्हें रास्ता दिखाएगी कैसे,
हम यूहीं न मर जाये औरो की तरह,
लोगो को हमारी याद आएगी कैसे.

समां चिनगारियो से न रोशन होगी,
रास्ते तो कट ही जायेंगे,
पर मंजर तूफ़ान का आने से पहले,
हम अपना आशियाँ लुटाये भी तो कैसे,

लोग पूछते हैं इस जख्म के बारे में,
कुछ तो बताते है इस की दवा भी,
खुद ही लुटाया था दामन अपना,
अब उन्हें बताएं भी तो कैसे.

प्रशांत कौसिक

 

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