Tuesday, October 18, 2011
Sunday, October 16, 2011
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
सागर होती होगी दुनिया, इक पल में मै तर जाऊँगा,
ठान लिया है जो मन में, इक दिन मै कर जाऊँगा,
वादा मेरा इस दुनिया से, इस जग में जीने वालों से,
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा .........
ना समझौता न सुनवाई, ना काफ़िर की तारीखें
कलम उठाकर सस्त्र बनाकर सीधा ही लड़ जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
मेरी शिक्षा मेरा धन है, जीवन है जो सब पर अरपन है
खौले खून तो जेठ महीना बहते आंसू सावन है
परछाईं में रहने वालों, मुझको पागल कहने वालों,
कलम बना के अपनी मलहम, पीड़ा सब हर जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
ठान लिया है जो मन में, इक दिन मै कर जाऊँगा,
वादा मेरा इस दुनिया से, इस जग में जीने वालों से,
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा .........
ना समझौता न सुनवाई, ना काफ़िर की तारीखें
कलम उठाकर सस्त्र बनाकर सीधा ही लड़ जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
मेरी शिक्षा मेरा धन है, जीवन है जो सब पर अरपन है
खौले खून तो जेठ महीना बहते आंसू सावन है
परछाईं में रहने वालों, मुझको पागल कहने वालों,
कलम बना के अपनी मलहम, पीड़ा सब हर जाऊँगा
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
जिस दिन मेरी कलम बिकेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा ........
Tuesday, September 27, 2011
चाह
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
चाहता मैं अपने हर साथियों के साथ रहना
चाहता हर होंठ पर मुस्कान धरना।
मैं दुखो से त्रान पाना चाहता हूँ।
मैं हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...। ।
सब सुखी, सानंद हों, यह कामना है
स्नेह की वर्षा सतत, यह भावना है,
मैं तुम्हारे प्यार का वरदान पाना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
तौलते है लोग पैसे से यंहा हर चीज को
वे फलों से आंकते है बीज को।
लाभ-लोभों की घुटन से मुक्त होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
अर्थ के सब दास दानाब बन रहे है
वाक् छल से मनुजता को छल रहे है।
मैं सहज इंसान होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ..
. मैं तुम्हारे प्यार का भूखा अकिंचन
चाहता हूँ मीन-सा एक मुक्त जीवन
मैं तुम्हारा हो संकुं, वरदान एकल चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
चाहता मैं अपने हर साथियों के साथ रहना
चाहता हर होंठ पर मुस्कान धरना।
मैं दुखो से त्रान पाना चाहता हूँ।
मैं हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...। ।
सब सुखी, सानंद हों, यह कामना है
स्नेह की वर्षा सतत, यह भावना है,
मैं तुम्हारे प्यार का वरदान पाना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
तौलते है लोग पैसे से यंहा हर चीज को
वे फलों से आंकते है बीज को।
लाभ-लोभों की घुटन से मुक्त होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
अर्थ के सब दास दानाब बन रहे है
वाक् छल से मनुजता को छल रहे है।
मैं सहज इंसान होना चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ..
. मैं तुम्हारे प्यार का भूखा अकिंचन
चाहता हूँ मीन-सा एक मुक्त जीवन
मैं तुम्हारा हो संकुं, वरदान एकल चाहता हूँ।
मै इक वसुंधरा चाहता हूँ
जहाँ हर दिल अजीज़ को बसाना चाहता हूँ...
Tuesday, September 6, 2011
मेरा जीवनपथ
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
मैं फूलों के सेज पर सोने नहीं,
कांटो पर चलने आया हूँ
तुम मुझको ना कहो विश्राम करो,
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को अब तो तूफ़ान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
अब तो अधर पर अंगार लेकर
पग पग पर मुश्कान लाया हूँ
अपने इस जीवन पथ में,
देखे हैं मैंने कई तूफ़ान यहाँ,
लौट गया जो भय से उनका क्या
मैं तो अब मर्घट से जीवन को बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चलाअब किस्मत से..
सौ बार हलाहल विष का प्याला पान करके आया हूँ ..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी में ही जलती है…
शोलो से ही श्रृंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही तो सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
अब तुम मेरे पग-पग पर जलती चट्टान धरो…
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
फूलों से जग आसान नहीं होता है…
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है…
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगति भी..
है नाश जहां निर्माण वहीं पर होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे…
तुम मेरी हर बस्ती अब वीरान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता…
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वे मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ़ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाषाण करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
मैं फूलों के सेज पर सोने नहीं,
कांटो पर चलने आया हूँ
तुम मुझको ना कहो विश्राम करो,
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को अब तो तूफ़ान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
अब तो अधर पर अंगार लेकर
पग पग पर मुश्कान लाया हूँ
अपने इस जीवन पथ में,
देखे हैं मैंने कई तूफ़ान यहाँ,
लौट गया जो भय से उनका क्या
मैं तो अब मर्घट से जीवन को बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चलाअब किस्मत से..
सौ बार हलाहल विष का प्याला पान करके आया हूँ ..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी में ही जलती है…
शोलो से ही श्रृंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही तो सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
अब तुम मेरे पग-पग पर जलती चट्टान धरो…
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
फूलों से जग आसान नहीं होता है…
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है…
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगति भी..
है नाश जहां निर्माण वहीं पर होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे…
तुम मेरी हर बस्ती अब वीरान करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता…
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वे मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ़ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाषाण करो..
मैं अंगारों से मिलने आया हूँ,
तुम यूं ना मेरी मंजिल आसान करो
Saturday, August 20, 2011
ज़रा सोचिएं (जय भारत )
देश को जिस हवा की जरूरत थी, आज शायद वो बयार बह निकली है । जिस साधारण व्यक्ति के असाधारण प्रतिभा को केंद्र सरकार हवा की मानिंद ले रही थी, वही आज सरकार के लिए खतरे की घंटी बन चुके हैं। आज उनके समर्थन में क्या बूढ़े क्या जवान, छात्र, कर्मचारी और व्यापारी भी सड़कों पर उतर रहे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि " कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थ्ार तो तबीयत से उछालो यारो"। यहाँ निश्चित रूप से एक नयी पृष्टभूमि तैयार हो रही है । एक नयी व्यवस्था कि स्थापना का यह आगाज़ है।
ऐसे में मेरे मन में कई प्रश्न उठते हैं और मन ससंकित हो उठता है। प्रश्न यह उठता है कि ये आन्दोलन कितने प्रतिशत सफल होगी? इसके उत्तर कि गहराई में कई और सवालो का जवाब हमें देना होगा । सबसे पहले हम कितने जागरूक हैं? क्या सिर्फ एक भीड़ का हिस्सा तो नहीं बन रहे? यह आन्दोलन जिस धरातल पर तैयार हो रही है उस बिल कि जानकारी कितने लोगो को है? इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब जब हमने अपने घरो में आग लगाईं है, तब तब उसपर दूसरों ने अपनी रोटियाँ सेकीं हैं। आज आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर चरम पर हैं । हम क्यों अपने ही घर को जलाने पर तुले हैं । आज जो ये भीड़ इकट्ठा हो रही है, उसमे कितनो को सत प्रतिशत मुद्दे कि समझ है?
इंदिरा गाँधी ने कहा था " शिक्षा वह माध्यम है जो हमें जाति, धर्म, तथा अन्य सभी बन्धनों से मुक्त करती है"। मेरा अर्थ कतई यहाँ किताबी शिक्षा से नहीं है। मै केवल यह कहना चाहता हूँ कि हम जागरूक होकर ससक्त बने और एक नए राष्ट्र निर्माण का अंग बने। आखिर कब तक हम एक चिंगारी के आस में अपने घरो में अपने आपको जलाते रहेंगे। जनमानस के उठते इस सैलाब को देखकर ये तो कहा ही जा सकता है कि कही ना कही और कुछ ना कुछ हमारे दिलो को कचोट रहा है । वर्तमान सरकार और व्यवस्था को ये तो समझ लेना चाहिए। हमे मिस्र और लीबिया कि क्रांति नहीं चाहिए क्योंकि उसके बाद का परिणाम भी तो हमे ही भुगतना है ।मै एक ऐसे व्यवस्था परिवर्तन कि बात केर रहा हूँ जिसमे हम सभी भागिदार बने और एक जागरूक भारत का निर्माण करें। हम भूल जाएँ अपनी गलतियों को लेकिन अपने आत्मा को पवित्र कर के और एक नए भारत का निर्माण करे ।
ऐसे में जरूरत है एक और जमीनी प्रयास की जिससे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का नाश हो सकता है। इसी महौल में समाज के कुछ जागरूक लोग संगठित होकर दूसरी मुहिम भी चला सकते हैं। यह मुहिम अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों, पुलिस थानों और अन्य उन हर प्रतिष्ठानों पर चलनी चाहिए जहां रोजाना आम जनता किसी न किसी रूप में जाने को विवश होती है। उसकी इसी विवशता का लाभ उठाकर सरकारी अहलकार हों या अधिकारी, सब ठगते हैं। इसका प्रतिकार कर समाज को एक नई दिशा दी जा सकती है। इतना ही नहीं यदि अन्ना को समर्थन दे रहे लोग ही यह संकल्प लें कि वह न तो घूस देंगे और न लेंगे, तो देश में एक नई सुबह आ सकती है। यह काम बहुत कठिन भी नहीं है, जरूरत इस बात की है कि हम भ्रष्टाचार का रस्मी विरोध करने के बजाए खुद ईमानदार बनें। ऐसा होने से निसंदेह हमारा देश फिर से सोने की चिडि़या बन सकता है। गरीब-अमीर हर कोई खुशहाल होगा। समाज में बढ़ रही कटुता पर अंकुश लगेगा।
धन्यवाद्
प्रशांत कौशिक
Friday, July 29, 2011
वक़्त नहीं
हर खुशिया है लोगो के दामन में,
पर एक हंसी के लिए ही वक़्त नहीं,
दिन रात दौड़ती इस दुनिया में
जीने के लिए ही वक़्त नहीं
माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का ही वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो मार चुके हम
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं
अब तो वक़्त नहीं भई वक़्त नहीं..............................
गैरों की हम क्या बात करें
जब अपनों के लिए भी वक़्त नहीं
आँखों में नींद तो है
पर अब सोने के लिए भी वक़्त नहीं
दिल तो भरा है जख्मों से
पर अब रोने के लिए भी वक़्त नहीं
पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
की अब थकने का भी वक़्त नहीं,
पराएँ एहसानों की क्या कद्र करें हम
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं
अब तू ही बता ऐ जिंदगी
इस जिंदगी का क्या होगा
जब हर पल मरने वालो को
जीने का भी वक़्त नहीं.............................
पर एक हंसी के लिए ही वक़्त नहीं,
दिन रात दौड़ती इस दुनिया में
जीने के लिए ही वक़्त नहीं
माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का ही वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो मार चुके हम
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं
अब तो वक़्त नहीं भई वक़्त नहीं..............................
गैरों की हम क्या बात करें
जब अपनों के लिए भी वक़्त नहीं
आँखों में नींद तो है
पर अब सोने के लिए भी वक़्त नहीं
दिल तो भरा है जख्मों से
पर अब रोने के लिए भी वक़्त नहीं
पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
की अब थकने का भी वक़्त नहीं,
पराएँ एहसानों की क्या कद्र करें हम
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं
अब तू ही बता ऐ जिंदगी
इस जिंदगी का क्या होगा
जब हर पल मरने वालो को
जीने का भी वक़्त नहीं.............................
Thursday, July 28, 2011
मौत
कितना हौसला मिला है तेरे आने से,
अब तो मेरा ये आशियाँ सजा है,
सब कुछ लुटाने से..............
क्या बताऊँ कि
अब तो जिंदगी को भुलाए ज़माने गुज़र गए
ज़हर खाए भी ज़माने गुज़र गए
बहुत तस्सवुर मिला है तेरे लौट आने से............
सोचता हूँ जीते हुए ज़माने गुजर गए
ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न आस
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए
सच ही कहता हूँ अब तो हर रोज ही
फजीहत लगती थी जिंदगी
अब तो ख़त्म हुआ ये सिलसिला
ऐ मौत!तुझको पाने से ...........................
अब तो मेरा ये आशियाँ सजा है,
सब कुछ लुटाने से..............
क्या बताऊँ कि
अब तो जिंदगी को भुलाए ज़माने गुज़र गए
ज़हर खाए भी ज़माने गुज़र गए
बहुत तस्सवुर मिला है तेरे लौट आने से............
सोचता हूँ जीते हुए ज़माने गुजर गए
ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न आस
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए
सच ही कहता हूँ अब तो हर रोज ही
फजीहत लगती थी जिंदगी
अब तो ख़त्म हुआ ये सिलसिला
ऐ मौत!तुझको पाने से ...........................
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